श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास काठिया बाबाजी महाराज

श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास काठिया बाबाजी महाराज

श्रीश्री १०८ स्वामी रामदास काठिया बाबाजी महाराज के पश्चात इस सम्प्रदाय के ५५तम आचार्य उनके सुयोग्य शिष्य श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास काठिया बावाजी महाराज हुए। वर्तमान बांग्लादेश में श्रीहट्ट जिले के बामै गाँव में एक ब्राह्मण कुल में इनका जन्म हुआ था । गहस्थाश्रम में इनका नाम था “श्री ताराकिशोर शर्मा चौघुरी”। ये बालक काल से ही अति तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न और भगवत् प्रेमी थे । बालक काल में ही ये रामायण, महाभारत आदि सदग्रन्थों का सप्रेम पाठ किया करते थे। श्रीहट्ट शहर के अंग्रेजी विद्यालय से उन्होंने एन्ट्रेन्स परीक्षा पास की और फिर कोलकाता में कॉलेज में भर्ती हुए। पहले विद्यासागर कॉलेज से F.A., और उसके बाद प्रेसिडेन्सी कॉलेज से B.A. पास की। फिर उन्होंने कोलकाता कॉलेज से दर्शनशास्त्र (Philosophy) में M.A. किया। वे बहुत कृति छात्र थे और एन्ट्रेन्स और F.A के बाद उन्हें स्कॉलरशिप भी मिली थी। M.A. करने के बाद उन्होंने वकालत में B.L. की उपाधि अर्जन की थी। वकालत पास करके वे पहले श्रीहट्ट में एवं तत्पश्चात कोलकाता हाईकोर्ट में वकालती करने लगे। वे कोलकाता के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में से एक माने जाते थे । अपने पेशेवर जीवन में उन्होंने बहुत अर्थ, ख्याति, प्रतिष्ठा इत्यादि अर्जन की थी।

जब उनकी उम्र मात्र १५ वर्ष की थी तब १० वर्ष की कन्या कुमारी अन्नदादेवी से उनका विवाह हो गया था।

कोलकाता में कुछ वर्षों तक वे ब्राह्म समाज के सदस्य रहे किन्तु वहाँ आध्यात्मिकता का अभाव देखकर उन्होंने उसे त्याग दिया और पुनः हिन्दु धर्म को ग्रहण किया। तत्पश्चात वे एक योगी सम्प्रदाय से युक्त हो गए और वहाँ प्राणायाम क्रिया का अभ्यास भी किया। वे जो भी करते थे सम्पूर्ण निष्ठा से और मन लगाकर करते थे। इसलिए योगी सम्प्रदाय की साधना करते समय उन्हें आनन्द तो मिला ही, साथ ही कई प्रकार की अलौकिक शक्तियां और विभूतियां भी मिलीं। परन्तु इससे उनका मन तृप्त नहीं हुआ और वे यथार्थ सद्‌गुरु का आश्रय लेने के लिए प्रयास करने लगे।

श्रीताराकिशोर चौधुरीजी प्रत्येक दिन गंगाजी में स्नान करने जाते थे। हावड़ा ब्रिज के निकट जगन्नाथ घाट पर एक दिन वे स्नान करने गए। उनके मन में तीव्र रूप से सद्‌गुरु का आश्रय पाने की इच्छा जाग्रत हो गयी थी। हठात् ही उनके मन में एक तीव्र ग्लानि और क्षोभ का भाव उदय हुआ और उन्होंने पतितपावनी गंगाजी की ओर देखकर मन ही मन उनसे इस प्रकार की आर्त प्रार्थना करने लगे, “हे पतित पावनी गंगे ! जीवों के असंख्य पापों को धोने के लिए ही तुम पृथ्वी पर आयी हो। तुम समस्त पाप विनाशिनी हो ऐसा सभी शास्त्र कहते हैं। माँ ! मैं क्या इतना बड़ा पापी हूँ कि तुम सर्व पापविनाशिनी होकर भी मेरे पापों को धो नहीं सकतीं ?” एक क्षण में उनकी आँखों के सामने का दृश्य बदल गया। उनकी आँखों के सामने अब जगन्नाथ घाट के स्थान पर गंगाजी का उद्गम स्थान गंगोत्री था और वहाँ पर विराजमान हर-पार्वती के दर्शन उन्हें हुए। भगवान शंकर ने उन्हें एक एकाक्षरी मंत्र प्रदान किया और उन्हें आश्वासन दिया कि उस मंत्र के जप के प्रभाव से उन्हें सद्‌गुरु की प्राप्त अवश्य ही होगी। फिर वे वहाँ से अन्तर्धान हो गए और गंगोत्री का दृश्य भी उनकी आँखों के सामने से ओझल हो गया। श्रीताराकिशोरजी बहुत निष्ठा के साथ उस बीज मंत्र का जाप करते थे। वे सद्‌गुरु पाने के लिए विभिन्न तीर्थों में भ्रमण करने लगे और इसी क्रम में वे एक मित्र के साथ प्रयागराज के कुम्भ मेले में आ पहुँचे। यहाँ पर उनकी भेँट उनके भावी गुरु, श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज से हुई। परन्तु उन्हें गुरु के रूप में ग्रहण करने से पहले वे इस बात को परखना चाहते थे कि श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज यथार्थ ही सद्‌गुरु हैं या नहीं। उन्होंने काठिया बाबाजी महाराज की कुछ-कुछ अलौकिक घटनाएं देखीं पर तब भी उनके मन का संशय नहीं मिटा। उसके बाद वे चैत्र मास में वृन्दावन पहुँचे लेकिन श्रीश्रीकाठिया बाबाजी महाराज के निकट कुछ दिन बिताने पर वे उनके विषय में इस प्रकार भ्रम में पड़े कि उन्हें ब्रह्मज्ञ महापुरुष मानना तो दूर की बात, श्री ताराकिशोरजी उन्हें एक साधारण सा अल्प शिक्षित साधु समझने लगे। परन्तु बाद में उनकी अलौकिक घटनाएं याद आती थीं तो उन्हें समझ नहीं आता था कि उनका यह सिद्धान्त ठीक है या भ्रम है। गुरु के विषय में बिना कोई निर्णय लिए वे संशयग्रस्त मन से कोलकाता लौट आए।

कोलकाता में एक रात्रि को वे अपने घर की छत पर शयन कर रहे थे कि अचानक उनकी नींद टूट गयी और वे उठ कर बैठ गए। उन्होंने देखा कि आकाश मार्ग से श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज आ रहे हैं। क्षण भर के बाद ही वे उस छत पर उतर गए और श्रीताराकिशोरजी के निकट आ खड़े हुए। उसके बाद श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज ने उनके कान में एक मंत्र का उपदेश दिया और फिर से आकाश मार्ग से प्रस्थान कर गए। श्रीताराकिशोरजी के मन में श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज के विषय में जो सदेह थे वे सब दूर हो गए और उन्हें अपने अभिलाषित सद्‌गुरु का आश्रय मिल गया है इस बात में उन्हें कोई शंका नहीं रही। अलौकिक प्रकार से दीक्षा मिलने पर भी उन्होंने वृन्दावन में सन् १८९५ साल में जन्माष्टमी के दिन लौकिक रूप से अपनी स्त्री सहित दीक्षा ग्रहण की थी।

यहाँ पर उनकी संसार आश्रम में रहने की शैली का उल्लेख करना आवश्यक है। श्रीताराकिशोरजी बहुत सत् जीवन व्यतीत करते थे। वे पेशे से वकील थे परन्तु कभी भी कोई मिथ्या मामला या मुकद्दमा नहीं लेते थे। जहाँ केस में कोई झूठ या मिथ्या करने या कहने की बात होती थी, उस मुवक्किल को वे लौटा देते थे। गरीब व्यक्ति का केस बिना पैसे और फीस के वे कई बार लड़े थे। कोलकाता में रहते समय उनके घर पर बहुत लोग रहते थे। घर पर कौन, कब, कहाँ से आकर रहने लगता था इसका कोई हिसाब किताब नहीं था। किसी को वहाँ आने जाने में किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं थी। वहाँ रहने से पहले कोई उनसे अनुमति माँगने की दरकार भी महसूस नहीं करता था। कभी कभी तो उनके मुवक्किल ही केस के चलते उनके यहाँ रुक जाया करते थे। उनके गाँव से बहुत से छात्र पढ़ने के लिए कोलकाता आते थे, वे भी उन्हीं के घर पर रहकर ही अपनी पढ़ाई करते थे। जो लोग रहते थे उनके लिए अन्न-वस्त्र इत्यादि की व्यवस्था श्रीताराकिशोरजी के अर्थ से होती थी। इतना कुछ होने पर भी किसी के मन में यह बात नहीं आती थी कि इन सबके लिए उनसे किसी को कुछ पूछने की या फिर उनसे इस विषय में अनुमति लेने की दरकार है। यह सब देखकर उनके एक परिचित आत्मीय ने इन सब बातों का उल्लेख करके उनसे इस अपव्यवस्था के विषय में अभियोग किया तो श्रीताराकिशोरजी ने कहा, “आपने जो-जो कहा है सब सत्य है लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इसमें दोष किसका है, मेरा या इन लोगों का। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि यह घर-संसार मेरा है। मेरा मानना है कि यह घर-संसार मेरे ठाकुरजी का है। उनके संसार में जैसे और लोग रहते हैं वैसे मैं भी रहता हूँ, वे जिस प्रकार मेरे लिए अन्न-वस्त्र का जुगाड़ करते हैं वैसे ही औरों के लिए भी करते हैं। इसलिए बाकि लोग मेरी अनमुति के लिए क्यों बैठे रहेंगे ? किसी भी कारण से मेरी आज्ञा की अपेक्षा क्यों करेंगे ?” गृहस्थ धर्म पालन करके भी किस प्रकार आसक्ति रहित होकर और भगवत् बुद्धि सम्पन्न होकर संसार में रहा जाता है और किस प्रकार निष्काम भावना से संसार की सेवा की जाती है, इसका आदर्श वे ही हमारे सामने रख गए हैं।

३५ वर्ष को आयु में उन्होंने श्रीश्री १०८ स्वामी रामदास काठिया बाबाजी महाराज से वृन्दावन में दीक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात गृहस्थाश्रम में रहकर वे निज गुरुजी महाराज की सेवा तन-मन-धन से करते रहे। गुरुजी की सेवा के लिए कोई भी काम करने में वे किसी प्रकार का संकोच नहीं करते थे। श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज उनसे आश्रम की सेवा के लिए कुछ लाने के लिए कहते तो वे गुरु के आदेश का विचार किए बिना वह सब कुछ ले आते थे। आश्रम की गो माता की सेवा के लिए वे अपने माथे पर साधारण कुली की तरह भूसी ढो कर लाते थे। गुरुजी के साथ वे बहुत बार ब्रज ८४ कोस की परिक्रमा के लिए गए और परिक्रमा के समय गुरुजी को किसी प्रकार की असुविधा न हो इस बात पर वे दृष्टि रखते थे। छिन्नू सिंह ने जो जमीन श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज को दान की थी वहाँ पर गुरुजी के लिए एक आश्रम बनाने की परिकल्पना उन्होंने की और श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज की अनुमति लेकर उन्होंने आश्रम का निर्माण करवाना आरम्भ कर दिया। वे कोलकाता से अर्थ भेजते थे और श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज अपनी देखरेख में वृन्दावन में “श्री निम्बार्क आश्रम” बनवाने का काम करते थे। श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज देहान्त तक इसी आश्रम में रहे लेकिन आश्रम निर्माण का काम सम्पूर्ण होने से पहले ही उन्होंने अपनी मर्त्यलीला समाप्त कर दी और गोलोकधाम के लिए प्रस्थान किया। इस आश्रम निर्माण के लिए श्री ताराकिशोरजी को प्राय बत्तीस हजार रुपये का ऋण लेना पड़ा था लेकिन गुरुजी की कृपा से उन्होंने कम समय में ही इस ऋण को शोध कर दिया था।

श्रीताराकिशोरजी अपनी साधना की ओर सर्वदा सजाग रहते थे। उनका नियम था कि कोर्ट से लौटने के बाद वे केस-मामला इत्यादि का किसी प्रकार का काम नहीं करते थे। वह समय वे जप-ध्यान, शास्त्र पाठ इत्यादि में व्यतीत करते थे। श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज उनकी गुरुभक्ति और गुरुसेवा से बहुत सन्तुष्ट हुए थे। वृन्दावन आश्रम में एक बार वे श्रीताराकिशोरजी के कमरे में आए और उनसे कहा, “बाबू, ये ठाकुरजी बहुत सामर्थी हैं और बहुत जाग्रत हैं। तुम अभी इनके पास जाओ और अपना मन चाहा वरदान इनसे माँग लो। वे तुम्हें तुम्हारा वर दान करेंगे।” श्रीताराकिशोरजी ने उत्तर दिया, “बाबा, आप मुझपर प्रसन्न होने से ही मेरा सर्वाभीष्ट सिद्ध हो जाएगा।” श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज ने कहा, “तुम जो कह रहे हो वह सच है। लेकिन कभी कभी परीक्षा भी तो करनी चाहिए वरना कैसे काम चलेगा ? ये बहुत करामती ठाकुरजी हैं, मैं तुमसे कह रहा हूँ कि तुम इनसे अपना मन चाहा वरदान माँग लो।” तब श्रीताराकिशोरजी गुरुजी का आदेश पालन करने के लिए मन्दिर में गए और श्रीठाकुरजी से मन ही मन प्रार्थना की कि, “आपने श्रीमद्भगवद्गीता में साधक की जो उच्चावस्था का वर्णन किया है और मनुष्य शरीर में साधना के द्वारा जितना दूर जाया जा सकता है, मैं साधना में वह सब पाना चाहता हूँ।” अपना वर माँग कर वे अपने स्थान पर लौट आए। तब काठिया बाबाजी महाराज उनके पास आए और उनके माँगे हुए वरदान को दोहराते हुए बोले, “तुम्हें यह सब मिलेगा, तुम्हारी ऋद्धि-सिद्धि सर्वदा अटूट रहेगी, तुम्हें भगवत् साक्षात्कार मिलेगा, महन्ताई भी मिलेगी। अगर यह सब सत्य न हो तो मैं यथार्थ साधु नहीं हूँ।” गुरुजी के श्रीमुख से इन वरदानो की वर्षा देखकर श्रीताराकिशोरजी स्वयं को धन्य मानने लगे।

अपने गुरुजी के देह त्याग करने के बाद प्राय पाँच वर्ष तक श्रीताराकिशोरजी गृहस्थाश्रम में रहे। गृहस्थाश्रम में ही इन्होंने अनेक आध्यात्मिक शास्त्रों का सरल व्याख्यापूर्वक प्रणयन किया। जिनमें ब्रह्मवादीऋषि और ब्रह्मविद्या, पाताञ्जल दर्शन, सांख्य दर्शन, वैशेषिक दर्शन, न्याय दर्शन, पूर्व मीमांसा दर्शन व वेदान्त दर्शन हैं। अपने गुरुजी का जीवन चरित भी उन्होंने गृहस्थाश्रम में ही लिखा था। ये समस्त ग्रन्थ प्रथम बार सन् १९११ में प्रकाशित हुए थे और प्रयोजनानुसार अब भी प्रकाशित होते रहते हैं। अपने गुरुजी महाराज के गोलोकवास के कुछ समय पश्चात वे गृहस्थाश्रम के विपुल अर्थ, यश, प्रतिष्ठा आदि को त्याग कर, भगवताराधना की तीव्र आकाँक्षा से प्रेरित होकर, ५६ वर्ष की आयु में वृन्दावन में नवनिर्मित श्री निम्बार्क आश्रम में उपस्थित हुए। आश्रमवास करते हुए उन्होंने कठोर तपस्या का प्रारम्भ किया। श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज के वरदान के अनुरूप दो वर्ष की कठोर तपस्या के बाद ५८ वर्ष की आयु में वे पूर्ण सिद्ध मनोरथ हो गए और उसके बाद ही उन्होंने दीक्षा देना आरम्भ किया। गुरुजी का दिया हुआ वरदान और भी प्रखर रूप से प्रकाशित हुआ जब वृन्दावन साधु-समाज के संत-महन्तों ने उन्हें सम्मिलित रूप से सन्यासाश्रम प्रदान किया और संतों ने उनका नाम “श्रीसंतदास” रखा, और साथ ही निम्बार्क आश्रम के महन्त और ब्रजबिदेही महन्त के पद पर आसीन किया। ये भी अपने गुरुजी महाराज की तरह “ब्रजबिदेही महंत” एवं “चतु:सम्प्रदाय के श्रीमहन्त” के पदों से सम्मानित हुए । भारतवर्ष में ये भी महाशक्तिशाली, ज्ञानी, भक्त और संत-सेवक के रूप में प्रसिद्ध हुए और सहस्रों शरणागत शिष्यों ने उनकी कृपा प्राप्त की। इनके दीक्षित शिष्यों की संख्या थी ३०३७ और साथ ही इनके ४१ साधु शिष्य भी थे। श्रीश्री संतदासजी महाराज ने श्रीमद्भगवत् गीता, भेदाभेद सिद्धान्त, गुरु-शिष्य संवाद आदि ग्रन्थों का प्रणयन वैराग्य आश्रम में रहते हुए किया था। इन्होंने शिवपुर (हावड़ा), भुवनेश्वर (उड़ीसा) और श्रीहट्ट (बांग्लादेश) में श्रीनिम्बार्क आश्रमों की स्थापना की। भुवनेश्वर का आश्रम उनके देह त्याग करने के बाद निर्मित हुआ था। उन्होंने पूर्ण ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मर्षि और शास्त्रों के मूर्तिमान स्वरूप रहकर असंख्य मोक्षाकाँक्षियों को मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर करते हुए सन् १९३५ ई० में मनुष्य लीला का सम्वरण कर गोलोकवास के लिए प्रस्थान किया।

श्रीश्रीसंतदासाष्टकम्

ब्रह्मणे संतदासाय विशुद्धये महात्मने।
आचार्याय मुनीन्द्राय ब्रजविदेहिने नमः ।। १ ।।

द्वैताद्वैतप्रवक्त्रे च श्रीनिम्बार्कानुगामिने ।
पारङ्गताय शास्त्राणां विद्यानां निधये नमः ।। २ ।।

नम: प्रशांतरूपाय भक्तिमुक्तिप्रदायिने ।
कलौ पूतावताराय पतितोद्धारिणे नमः ।। ३ ।।

नमस्ते निर्विकाराय स्वरूपानन्दरूपिणे ।
ब्रह्मभूतस्वरूपाय सर्वभूतात्मने नमः ।। ४ ।।

सर्वपापप्रणाशाय यमपाशापहारिणे ।
सर्वभूतनिवासाय स्वात्मारामाय ते नमः ।। ५ ।।

श्रीरामदासशिष्याय कृष्णपदविहारिणे ।
स्वानन्दपरिपूर्णाय नमो विज्ञानमूर्तये ।। ६ ।।

क्रीड़ा संदृश्यते येन कृष्णस्य परमात्मनः ।।
वृन्दावननिवासाय संतदासाय ते नमः ।। ७ ।।

स्वस्थाने स्थापिता येन साधुसेवा कलौ युगे।
प्रणमामो वयं नित्यं संतदासं तमन्वहम् ।। ८ ।।

गुर्वष्टकमिदं स्तोत्रं प्रेमदासेन भाषितम् ।।
श्रद्धया प्रपठन् नित्यं प्रयाति परमां गतिम् ।।
तस्य क्वापि भयं नास्ति तम: सूर्योदये यथा ।
त्रिसंध्यं यः पठेत् स्तोत्रं स भक्तिं लभते पराम् ।।

इति प्रेमदासेन कृतं संतदासाष्टकम् समाप्तम् ।।

CONTINUE READING
Share this post
Come2theweb