काठिया बाबा श्रीश्री १०८ स्वामी कृष्णदासजी महाराज

काठिया बाबा श्रीश्री १०८ स्वामी कृष्णदासजी महाराज

इस सम्प्रदाय के ५७तम आचार्य थे मेरे परम पूजनीय, प्रातःस्मरणीय, परमपूज्यपाद परमाराध्य श्रीगुरुदेव, काठिया बाबा श्रीश्री १०८ स्वामी कृष्णदासजी महाराज । सद्‌गुरु की कृपा से किस प्रकार एक जीवन धन्य हो सकता है और गुरु की कृपा से जीवित रहते ही भगवद्दर्शन प्राप्त हो सकता है, मेरे गुरुजी का जीवन इन दोनों बातों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सद्‌गुरु की कृपा देश, काल और देह के द्वारा सीमित नहीं रहती और गुरु का आदेश निर्विचार रूप से पालन करके गुरुभक्ति को प्राप्त करके किस प्रकार इस घोर कलियुग में भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, इसका प्रमाण मेरे गुरुजी के जीवन में स्पष्ट रूप से मिलता है। यहाँ उनके जीवन का सम्पूर्ण विवरण देना सम्भव नहीं है और न ही इस लेखनी का यह उद्देश्य है। परन्तु, उनके द्वारा दिखाये गए आदर्श को पालन करके कोई भी जीव अनन्या गुरुभक्ति प्राप्त करके गुरुकृपा के द्वारा परम मंगल मोक्ष को प्राप्त कर इस नश्वर देह में ही जीवन्मुक्त हो सकता है, इस आदर्श को किञ्चित प्रकाश करना ही इस संक्षिप्त विवरण का सार है।

श्रीश्रीगुरुजी महाराज का जन्म १४ अक्तूबर सन् १९३९ में बिहार संथाल परगणा (अधुना झाड़खण्ड राज्य का साहिबगंज जिला) में पतितोद्धारिणी गंगा के तट पर बसे राजमहल नामक गाँव में हुआ। उनका पूर्वाश्रम का नाम था श्रीकृष्णानंद सिंह। उनके पिता स्वर्गीय रमानाथ सिंह और माता स्वर्गीया हृदयवासिनी देवी दोनों ही निष्ठावान वैष्णव थे और निम्बार्क सम्प्रदाय के ५५तम आचार्य श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास काठिया बाबाजी महाराज के आश्रित शिष्य-शिष्या थे। तीन भाई और चार बहिनों में कनिष्ठतम होने के कारण श्रीश्रीगुरुजी महाराज सभी के प्रियपात्र थे। उनके घर में एक पूजा का कमरा था जिसमें श्रीश्रीठाकुरजी, श्रीश्री १०८ स्वामी रामदास काठिया बाबाजी महाराज और श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास काठिया बाबाजी महाराज की पूजा, आरती आदि प्रत्येक दिन निष्ठापूर्वक की जाती थी। श्रीश्रीसंतदासजी महाराज को परिवार के सभी सदस्य “महाराजजी” कहकर संबोधन किया करते थे। बाल्यकाल से ही श्रीश्रीगुरुजी महाराज को अपने “महाराज जी ” पर अटूट श्रद्धा और अत्यधिक भक्ति थी। ६ या ७ वर्ष की आयु में ही उन्होंने श्रीश्री १०८ स्वामी रामदास काठिया बाबाजी महाराज और “महाराज जी” के जीवन-चरित प्रथम बार पढ़े थे। १३ वर्ष की आयु में उन्होंने द्वितीय बार इन दोनों ग्रंथों को पढ़ा। इस बार “महाराज जी” के व्यक्तित्व से श्रीश्रीगुरुजी महाराज अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्हें ऐसा लगने लगा कि “महाराज जी” के पदचिह्नों पर चलकर कोई भी व्यक्ति सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन में कृतकृत्य हो सकता है। तभी से वे मन ही मन “महाराज जी” से प्रार्थना करने लगे कि वे कृपा करके अपने दिखाये हुए मार्ग पर उन्हें भी ले चलें। वे “महाराजजी” की छवि के सामने खड़े होकर इस प्रकार प्रार्थना करते थे, “महाराजजी, आप जिस पथ पर चले थे आप मुझे भी उसी पथ पर ले जाईये। आप कृपा कीजिए कि मैं भी आपके आदर्श का अनुसरण कर सकूँ।” उनके परवर्ती जीवन के साथ श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास जी महाराज के जीवन की समानता को देखकर कहा जा सकता है कि उनके बालक मन की आंतरिक आकाँक्षा को उनके “महाराज जी” ने सुना और कृपा-परवश होकर उसे पूर्ण भी किया। इस बात की पुष्टि बाद में श्रीश्रीगुरुजी महाराज के परमाराध्य गुरुदेव श्रीश्री १०८ स्वामी प्रेमदास काठिया बाबाजी महाराज ने स्वयं भी अन्यान्य भक्तों के समक्ष की थी।

बचपन में ही श्रीश्रीगुरुजी में भगवद्दर्शन की आकाँक्षा प्रस्फुटित हो गई थी। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भगवान के दर्शन के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, यह धारणा उनके मन में बहुत कम उम्र से दृढ़रूप से घर कर गयी थी। “वन में जाकर तपस्या करने से भगवद्दर्शन होता है”, इस प्रकार चिन्ता करके वे प्राय: ही संध्या से पूर्व अपने घर के फूलों के बगीचे में बैठकर भगवत्-ध्यान किया करते थे। यह सब शिशु सुलभ आचरण होने पर भी वे अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान थे।

भगवान का दर्शन पाने के लिए प्रथम कार्य है सद्‌गुरु का आश्रय लेना। सन् १९५४ में जब वे School final (मैट्रिक) की फाईनल परीक्षा के लिए प्रस्तुत हो रहे थे तब उनके मन में दीक्षा लेने की इच्छा स्वतः जाग्रत हुई और यह इच्छा दिन प्रतिदिन तीव्र से तीव्रतर होने लगी। उस समय उनकी उम्र केवल १५ वर्ष थी और किसी ने भी उन्हें दीक्षा लेने के लिए नहीं कहा था। यहाँ तक कि उनके पिता ने तो पहले इस बात को हल्के में लिया और अपने पुत्र की इस इच्छा को टाल देने का प्रयास किया। पिता ने कहा, “अभी तुम्हारी उम्र कम है, दीक्षा लेने से बहुत से नियमों का पालन पड़ता है। अभी मन लगाकर पढ़ो, बाद में देखा जाएगा।” परन्तु श्रीश्रीगुरुजी महाराज की दीक्षा लेने की इच्छा तीव्र से तीव्रतर होती गयी और अंत में उन्होंने अपने पिता से कहा, “मुझे अगर दीक्षा नहीं मिली तो मैं मैट्रिक की परीक्षा नहीं दूँगा।” पिता तब विवश होकर पुत्र की दीक्षा की व्यवस्था करने को तत्पर हुए। उन्होंने वृन्दावन के निम्बार्क आश्रम के महन्त, श्रीश्री प्रेमदासजी महाराज को पत्र लिखर अपने पुत्र की दीक्षा लेने की इच्छा के विषय में बताया। हमारे दादागुरुजी श्रीश्री गुरुजी महाराज को दीक्षा लेने के लिए सम्मत हो गए परन्तु उन्होंने पत्र के उत्तर में लिखा कि, वे जब शिवपुर के निम्बार्क आश्रम में आएंगे तभी दीक्षा हो पाएगी। उन्होंने यह भी लिखा,“अपने पुत्र से कहिए कि मन लगाकर पढ़े।” उन्हें दीक्षा मिलेगी यह जानकर श्रीश्री गुरुजी महाराज निश्चिन्त हो गए और मन लगाकर पढ़ने लगे।

वे सन् १९५५ के मार्च या अप्रैल महीने में कोलकाता के निकट हावड़ा में शिवपुर स्थित निम्बार्क आश्रम में पिता के साथ गये और वहाँ श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने ब्रजविदेही महंत और वैष्णव चतु:सम्प्रदाय के श्रीमहंत श्रीश्री १०८ स्वामी प्रेमदास काठिया बाबाजी महाराज से दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा मंत्र प्रदान करने के पश्चात गुरुदेव ने श्रीश्रीगुरुजी महाराज से कहा, “मैंने तुम्हें अपने श्रीश्रीगुरुजी महाराज (श्रीश्री १०८ स्वामी संतदास जी महाराज) के श्रीचरणों में अर्पण किया और उन्होंने तुम्हें ग्रहण कर श्रीश्रीठाकुरजी के श्रीचरणों मे अर्पण कर दिया है।” अपने चिरप्रिय “महाराज जी” का आश्रय लाभ हो गया है, यह सुनकर श्रीश्रीगुरुजी महाराज का मन आनन्द से परिपूर्ण हो गया। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि उनकी कई जन्मों की इच्छा अब जाकर पूर्ण हुई है।

बचपन से ही श्रीश्रीगुरुजी महाराज बहुत साहसी प्रकृति के थे और डर नाम के किसी भाव से वे मानो अपरिचित थे। अपने कई कारनामों के लिए उन्हें माता-पिता से फटकार भी मिलती थी। एकबार तो उनके इसी स्वभाव ने उनके अपने प्राणों को संकट में डाल दिया था। तब उनकी उम्र केवल ९ वर्ष की थी। एक बार मित्रों के साथ पतंग उड़ाते समय उनकी पतंग एक ऊँचे आम के पेड़ की शाखा में उलझ गई। मित्रों के मना करने भी वे उस पेड़ पर चढ़ गए और अपनी पतंग के डाल से छुड़ाने में सफल भी हो गए। परन्तु, पेड़ से नीचे उतरते समय उनका पाँव एक सूखी हुई डाल पर पड़ा, डाल टूट गई और वे उस ऊँची डाल से निचे आ गिरे। पेड़ के नीचे रखे पत्थरों पर उनका सर टकराया, उनका माथा फट गया और उस घाव से रक्त बहने लगा। प्राथमिक चिकित्सा के बाद उन्हें कोलकाता के मेडिकल कॉलेज में ले जाया गया जहाँ एक सर्जन ने ऑपरेशन करके उनके मस्तिष्क में गढ़े हुए पत्थर के कई छोटे-छोटे टुकड़े निकाले। सर्जरी के बाद डाक्टर ने उनकी माता से कहा कि, “इस बालक के बुद्धि-केन्द्र में बहुत गहरी चोट लगी है। यह बालक ज्यादा पढ़ लिख नहीं पायेगा, इसके लिये इसे दोष नहीं देना।” परन्तु भविष्य में श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने परमपूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से एक कृती छात्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने अपने गाँव के विद्यालय से प्राथमिक शिक्षा अर्जन कर School final परीक्षा में सर्वोच्च स्थान, स्वर्णपदक और दो वर्ष की छात्रवृत्ति लाभ की थी।

उसके बाद राँची के सेंट जैवियर्स कॉलेज से विज्ञान शास्त्र लेकर ISc (Inter science) परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। ISc करने के बाद मात्र १७ वर्ष  आयु में वे बिहार विश्वविद्यालय के दरभंगा मेडिकल कॉलेज में M.B.B.S. कोर्स में भर्ती हुए। सन् १९६२ में MBBS पास करने बाद वे उन्होंने सन् १९६६ में Medicine में भारत की तत्कालीन सर्वोच्च उपाधि M.D. की परीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान अधिकार किया। मेडिकल कॉलेज के अध्ययन काल में उन्हें अनेक छात्रवृत्तियों से सम्मानित किया गया था। श्रीश्रीगुरुजी महाराज केवल तीक्ष्णधी, मेधावी और परिश्रमी विद्यार्थी ही नहीं थे। वे कॉलेज फुटबाल टीम के कप्तान, महाविद्यालय के Swimming Charmpion भी थे। इस के अतिरिक्त वे Table tennis, Athletics और कैरम भी खेलते थे और Body building, Weight lifting आदि भी किया करते थे। इन सब क्रीड़ाओं के अलावा उन्होंने प्रबंध लेखन प्रतियोगिता की अहिंदी भाषी श्रेणी में प्रथम स्थान अधिकार किया था और कविता, कहानी लिखना, वायलिन और बांसुरी वादन, अभिनय व चित्रांकन भी उनके शौक थे। इन सब क्रियाओं और अध्ययन के साथ ही साथ अपने आध्यात्मिक विकास की ओर भी उनकी सतर्क दृष्टि रहती थी। वे अपने गुरुदेव प्रदत्त आदेशों, यथा – नियमित तिलक-स्वरूप करना, मंत्रजप और खाद्याखाद्य विचार आदि के पालन में किसी प्रकार की शिथिलता आने नहीं देते थे। दीक्षित शिष्यों के लिये अंडा, माँस, प्याज, लहसुन और मद्यपान निषेध है, परन्तु छात्रावास की कैन्टीन में तरकारी और दाल में प्याज व लहसुन का प्रयोग होता था। इसलिये श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने कॉलेज के नौ वर्ष अधिकतर दही-भात या फिर रोटी-आलू की भुजिया खाकर ही बिताए थे।

चिकित्सा शास्त्र में अपने देश की सर्वोच्च मेडिकल डिग्री M.D. अर्जन कर श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने गुरुदेव की सम्मति और आशीर्वाद लेकर उच्चतर शिक्षा लाभ के लिये सन् १९६६ में अमरीका गये। वहाँ अपने विषय (Internal Medicine) के विभिन्न विभागों में उच्चतम शिक्षा लाभ कर प्राय ५ वर्ष रहने के पश्चात उन्होंने कनाडा जाकर चिकित्सक के रूप में कार्य करना आरम्भ किया। वहाँ वे Cardiologist (हृद्-रोग विशेषज्ञ) के रूप में कार्यरत रहे और अमरीका की A.B.I.M., E.C.C.P, F.A.C.P. E.A.C.A. और कनाडा की L.M.C.C. डिग्रियां प्राप्त की थीं।

अमरीका-वास के एक वर्ष बाद, सन् १९६७ में श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने गुरुदेव की अनुमति ग्रहण करके भारत लौटे और कुमारी सुदेष्णा सरकार के साथ परिणय-सूत्र में आबद्ध हुए। श्रीश्रीगुरुमाँ (श्रीमती सुदेष्णा देवी) भी श्रीश्रीगुरुजी महाराज के गुरुदेव श्रीश्री १०८ स्वामी प्रेमदास काठिया बाबाजी महाराज से दीक्षा ग्रहण कर अपने स्वामी की यथार्थ अनुगामिनी और अध्यात्म जीवन की सहचारिणी हुईं।

विवाह के बाद वे प्राय साड़े चार वर्ष तक अमेरिका में टोलिडो शहर के मौमि वैली हस्पताल में उच्च सिक्षा प्राप्त करते रहे और साथ ही वहीं काम करते रहे। उस हस्पताल के वे चीफ रेजिडेन्ट बने। अमेरिका में रहते समय उनके हाथ में अर्थ बहुत अधिक नहीं था लेकिन उन्हें कभी किसी प्रकार के अभाव का बोध नहीं होता था। इतना ही नहीं, वे अपने कम वेतन में से भी श्रीठाकुरजी की नित्य सेवा के लिए कुछ अर्थ अपने गुरुजी को शिवपुर के निम्बार्क आश्रम में भेजते थे। अमेरिका में साड़े चार साल रहने के बाद सन् १९७१ में वे कनाडा चले गए। कनाडा का कैम्पबेल्टन शहर उनके पेशेवर जीवन के अगले १८ साल तक कर्मक्षेत्र रहा।

कनाडा के अपने कर्म-जीवन में श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने अतुलनीय लोकप्रियता, विपुल यश और ख्याति के प्राप्त की थी। Cardiology उनके कार्य का प्रमुख विभाग होने पर भी Kidney और Chest विभागों में भी श्रीश्रीगुरुजी महाराज को विशेष दक्षता हासिल थी। केवल Cardiologist के रूप में ही नहीं बल्कि Internal Medicine के विशेषज्ञ के रूप में भी वे ख्यातिप्राप्त थे। अपने अस्पताल के हृद्-रोग विभाग (Cardiology department) को उन्होंने एक अत्याधुनिक विभाग के रूप में परिणत किया और Kidney department एवं Pulmonary department का भी वहाँ सूत्रपात किया। वे कई वर्षों तक अपने अस्पताल के Chief of Medicine पद पर कार्यरत रहे। उनकी रोग-निर्णय (Diagnosis) क्षमता इतनी प्रबल थी कि रोगी को केवल आँखों से देखकर और कुछ सरल प्रश्न पूछकर ही वे अधिकांश क्षेत्रों में दुर्बोध्य और विरल रोगों को भी चिह्नित कर लिया करते थे और फिर अपने निर्णय की पुष्टि के लिये जाँच आदि करवाते थे। उनकी यह क्षमता देखकर अन्यान्य चिकित्सकगण बहुत विस्मित होते थे। उस देश के कुछ गोरे चिकित्सक मुक्त-कंठ से उनकी प्रशंसा कर उन्हें A walking dictionary of Medicine (चिकित्सा शास्त्र का शब्दकोश) कहते थे। वे यह भी कहते थे कि यदि Medicine के विषय पर कोई भी प्रश्न या संशय हो तो डा. सिंह को पूछने पर सर्वदा ही उसका सठीक उत्तर मिल जाता है।

उनके गुरुजी ने उन्हें कहा था कि, “भगवान स्वयं तुम्हारे निकट रोगी के रूप में आते हैं, तुम इस भावना से रोगियों की सेवा करना।” श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने गुरुजी की इस बात को कभी नहीं भूले और अपने समस्त कर्मजीवन में उन्होंने कभी किसी भी कारण से किसी भी रोगी के देखने से मना नहीं किया। अपने गुरुजी के उपदेशानुसार वे यथासाध्य और भगवत्-भाव से रोगियों की सेवा करते थे। यदि उनके पास कोई रोगी इलाज के लिए आता था तो वे पूर्ण निष्ठा से उसका इलाज करने का प्रयास करते थे। समय, खान-पान, नींद-विश्राम को तिलांजलि देकर वे रोगियों की सेवा करते थे। इसी कारण से वे अपने सहकर्मी डाक्टरों से, अपने नर्सिंग स्टाफ से, रोगियों और उनके आत्मीय स्वजनों से बहुत सम्मान और आदर पाते थे। जो रोगी ठीक हो जाते थे वे उनके प्रति कृतज्ञता प्रकाश करना नहीं भूलते थे और उन्हें विभिन्न प्रकार से धन्यवाद करते थे। इतनी अधिक ख्याति, यश और विपुल अर्थ को प्राप्त करके भी उन्हें कभी नहीं लगा कि ये सब उनके कर्तृत्व का फल है। इन सब प्राप्तियों को वे अपने गुरुजी के आशीर्वाद की अहैतुकी कृपा मानकर इसी बुद्धि और ज्ञान में स्थितप्रज्ञ रहते थे।

अचिन्तनीय कर्म-व्यस्तता रहने पर भी वे अपना साधन-भजन नियमित करते थे। उन्होंने वहाँ विदेश में भी ७-८ बार सवा लाख मंत्र-जप के अनुष्ठानरूप कठोर तपस्या की थी। इस समय वे आवश्यकतातिरिक्त वार्तालाप न कर प्राय मौनी रहा करते थे और स्वपाक रसोई करके भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। अपने सम्प्रदाय के उत्सवादि पर्वो पर वे यथारीति पूजा, भोग और आरती आदि किया करते थे।

गुरु-सान्निध्य लाभ के लिये वे हर एक वर्ष बाद सपरिवार भारत आते थे और यथासंभव अपने गुरुजी महाराज का सान्निध्य पाने का प्रयास करते थे। अपने गुरुजी महाराज के भी वे अतिशय स्नेह के पात्र थे। श्रीश्री दादागुरुजी महाराज भी प्रिय शिष्य की इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्रीश्रीगुरुजी महाराज को सपरिवार तीर्थ भ्रमण के लिए ले जाते थे। इन यात्राओं के समय ही उनके गुरुजी महाराज ने उन्हें अपने साथ ले जाकर भारतवर्ष के प्राय सभी मुख्य तीर्थ-स्थल, कुंभ मेला आदि का दर्शन कराया था। इन यात्राओं के समय वे अपने गुरुजी की साधारण दास की तरह सेवा करते थे। गुरुजी का सामान ढोना, उनके लिए दवा इत्यादि की व्यवस्था करना, जब जो जरूरत पड़ती थे, वे बिना संकोच के सब करते थे। उस समय उन्हें देखकर ऐसा लगता ही नहीं था कि वे कनाडा में स्वनामधन्य, उच्च शिक्षित, स्पेशलिस्ट डाक्टर हैं। निष्काम सेवा और हिमालय सदृश अटल गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर उनके भगवत्स्वरूप ब्रह्मज्ञ गुरुजी महाराज ने पत्रों के माध्यम से नानाविध सर्वमनस्कामना पूर्ण होने के वरदान दिए थे। उनकी निःस्वार्थ सेवा से श्रीश्री दादागुरुजी महाराज बहुत सन्तुष्ट हुए थे और पुरीक्षेत्र में समुद्र के तट पर उन्होंने श्रीश्रीगुरुजी महाराज को भगवत् साक्षात्कार, और आत्मज्ञान की प्राप्ति का वरदान साक्षात् रूप से भी दिया था। यह घटना सन् १९७९ की है।

श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने अपने गुरुजी से एक पृथक नया आश्रम बनाने का अनुरोध किया था। जब उनके गुरुजी महाराज ने कोलकाता में श्रीश्री संतदास बाबा आश्रम के निर्माण का सिद्धांत लिया तो श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने आश्रम-निर्माण, विग्रह-प्रतिष्ठा, आश्रम-प्रतिष्ठा उत्सव, और विष्णुयज्ञ का सम्पूर्ण व्ययभार स्वत:प्रवृत्त होकर अकेले ही वहन किया था। तत्पश्चात उन्होंने वृंदावन-स्थित श्रीश्री दादागुरुजी महाराज द्वारा प्रतिष्ठित श्रीश्री संतदास बाबा आश्रम के जीर्णोद्धार और कुछ कक्षों के निर्माण का व्ययभार भी वहन किया। इस समय उनकी Practice (चिकित्सा-कार्य) सद्यप्रतिष्ठित होने के कारण उनका अर्थोपार्जन बहुत अधिक नहीं था, फिर भी वे नि:संकोच भाव से अपने उपार्जित अर्थ का प्राय सर्वस्व ही अपने गुरुजी के चरणों में अर्पण कर देते थे।

श्रीश्री गुरुजी महाराज की इच्छा थी कि श्रीगरीबदासजी जिस प्रकार श्रीश्री काठिया बाबाजी महाराज की सेवा करते थे, वे भी उसी प्राकर अपने गुरुजी के समीप रहकर उनकी सेवा करें। इस विषय पर संकल्प लेकर उन्होंने अपने गुरुजी से सन्यास आश्रम ग्रहण करके साधु होने की याचना की। वे विदेश से पत्र लिखकर बारम्बार अपने गुरुजी से उन्हें सन्यास देने के लिए अनुरोध करते थे। श्रीश्री दादागुरुजी महाराज उन्हें सन्यास देने के लिए सम्मत हो गए और श्रीश्री गुरुजी महाराज ने विचार किया था कि सन् १९८२ में वे कनाडा त्यागकर स्वदेश लौट आएंगे और सन्यास ग्रहण करके अपने श्रीगुरुजी के चरणों में अपना शेष जीवन व्यतीत करेंगे। परंतु विधि का विधान अन्य प्राकर था और सन् १९८१ में श्रीश्री दादागुरुजी महाराज अपनी नश्वर देह त्याग कर गोलोकधाम के लिए प्रस्थान कर गए। यह संवाद सुनकर श्रीश्रीगुरुजी महाराज को लगा मानो उनका सर्वस्व लुट गया। उन्हें लगा कि उनके गुरुजी ने उन्हें सन्यास देने का सिद्धान्त बदल दिया है। श्रीश्रीगुरुजी महाराज और श्रीश्रीगुरुमाँ प्रथम सुयोग पाकर भारत आ गए। अपने गुरुजी के तिरोधान के लिए श्रीश्री गुरुजी महाराज ने वृन्दावन और लस्करपुर के आश्रमों में वृहत् भण्डारों का आयोजन करवाया।

गुरुजी के दहावसान के बाद श्रीश्री गुरुजी महाराज प्राय आठ साल तक विदेश में रहे। गुरुजी महाराज के मानव-देह सम्वरण के प्राय ९ वर्ष बाद जब श्रीश्रीगुरुजी महाराज की ख्याति और अर्थोपार्जन उच्चता की शिखर पर थीं, तब वे सन्यासाश्रम ग्रहण करने के उद्देश्य से अपने सुप्रतिष्ठित कर्मजीवन को तृणवत् त्याग कर सन् १९९० में स्वदेश लौट आये। सन् १९८९ में जब उन्होंने अपने पेशेवर जीवन से अवकाश लेने का सिद्धान्त लिया तब उनकी वार्षिक आय कई लाखों डॉलर थी। उनके डाक्टरी पेशे को त्याग करने के सिद्धान्त को सुनकर वहाँ के शहरवासी रोते थे। जिन रोगियों का वे इलाज करते थे वे उन्हं बारम्बार अपने सिद्धान्त को वापस लेने का आग्रह और अनुरोध करते थे। इस तरह का राना धोना स्वदेश लौटने के समय तक, प्राय ७-४ माह तक चलता रहा। इस तरह का शहरवासियों का प्रेम और ऐसी प्रतिक्रिया अभूतपूर्व थी। वहाँ, उस शहर में पहले भी कई डाक्टर आये और गये, परन्तु इस तरह किसी एक डाक्टर के लिये प्रेम का प्रदर्शन पहले कभी भी नहीं हुआ था। उनके सहकर्मी डाक्टर भी उनके इस संकल्प को सुनकर दुःखी हो गए थे। उनके अस्पताल के प्रबन्धक ने श्रीश्री गुरुजी महाराज से पूछा कि स्वदेश लौटकर वे डाक्टरी करेंगे या नहीं। श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने उत्तर दिया कि वे अपना शेष जीवन आध्यात्मिक अनुशीलन करके व्यतीत करना चाहते हैं। वे भारत लौटकर मेडिसिन की प्रैक्टस नहीं करेंगे। उस महिला ने कुछ दुःखित स्वर में कहा, “मुझे भारत के लिए दुःख है क्योंकि उन्हें कभी पता नहीं लगेगा कि आप कितने महान स्तर के डाक्टर हैं।”

उनके गुरुजी महाराज ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में चिह्नित कर दिया था। भारत लौट कर अपनी स्त्री और पुत्रद्वय के सुचारू रूप से जीवन यापन करने की सर्वरूपेण व्यवस्था कर, उन सभी की और परिवार के अन्यान्य सदस्यों की सम्मतिपूर्वक अपना सर्वस्व त्यागकर, १ मार्च सन् १९९० को वे कोलकाता के लस्करपुर स्थित श्रीश्रीसंतदास बाबा आश्रम आ गए और वहाँ नियमित रूप से वास करने लगे। उसी वर्ष बुद्धपूर्णिमा की पुण्यतिथि को श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने वृंदावन के गोपीनाथ बाजार स्थित श्रीश्रीसंतदास बाबा आश्रम में अपने श्रीश्रीगुरुदेव के विग्रह के सम्मुख, अपने साधुगुरुभ्रातागण एवं काकागुरु की उपस्थिति में विधिवत् सन्यास आश्रम ग्रहण किया। उनके गुरुदेव की इच्छानुसार ही उनका सन्यास-आश्रम का नाम हुआ “कृष्णदास”। सन्यास ग्रहण कर उन्होंने पुन: कोलकाता के श्रीश्रीसंतदास बाबा आश्रम लौट कर वहाँ की सेवा-पूजा आदि का दायित्व ग्रहण किया और श्रीश्रीसद्‌गुरुरूपी लीला आरम्भ की और दीक्षा प्रदान करने लगे। उनके दो पुत्र ही उनके प्रथम दो शिष्य हुए। ३ जून सन् १९९० को गंगादशहरा के दिन अपने साधु-गुरुभ्राता और अन्यान्य साधु-महन्तगणों के द्वारा वे कोलकाता के लस्करपुर स्थित श्रीश्रीसंतदास बाबा आश्रम के महंत पद पर अभिषिक्त हुए।

तत्पश्चात वे आश्रम के सभी कार्यों को दक्षता के साथ और भगवत्सेवा भाव से किया करते थे। आश्रमवास की प्रारम्भिक अवस्था में जन-बल के अभाव के कारण वे स्वयं ही आश्रम के सभी कार्य यथा, श्रीश्रीठाकुरजी का उत्थान, मंदिर-मार्जन (पौंछना), श्रीश्रीठाकुरजी का स्नान, श्रृंगार, आरती आदि, भोग के लिये रसोई करना, गोसेवा, बागीचे में फल, फूल और सब्जी लगाना, आश्रम के आय-व्यय का हिसाब रखना; अभ्यागत, अतिथि व भक्तों की सेवा करना इत्यादि अम्लानवदन से और प्रफुल्लचित्त होकर करते थे। वे दिन भर इन सब सेवा-कार्यों में व्यस्त रहकर भी देर रात तक साधन-भजन रूप कठोर तपस्या करते थे। उस समय वे दिन में तीन घंटे ही विश्राम करते थे।

२५ अप्रैल सन् १९९२ को उज्जयिनी महाकुंभ में अखिल भारतीय वैष्णव साधु समाज के द्वारा श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने गुरुदेव द्वारा स्थापित काठिया बाबा श्रीश्रीरामदास खालसा के श्रीमहंत पद पर विधिवत् अभिषिक्त हुए। तब से वे प्रत्येक कुंभ मेले में जाकर श्रीमहंतोचित दायित्व का पालन करते हुए असंख्य संतों, भक्तों और आगंतुकों की सेवा करते थे। उनका कहना था कि साधुसेवा, भक्तों की सेवा और श्रीठाकुरजी के विग्रह की सेवा में किसी प्रकार का अंतर नहीं है, तीनों ही समान फल दान करने वाली हैं।

श्रीश्रीगुरुजी महाराज ने अपने विदेश-वास के समय ही निम्बार्क सम्प्रदाय के अधिकांश धर्मग्रंथों का, विभिन्न दर्शन-शास्त्रों और उपनिषद् आदि अन्यान्य धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया था और इन शास्त्रों के आधार पर कई जटिल विषयों पर प्रबंध भी लिखे थे। इन के अतिरिक्त गृहस्थाश्रम में रहते हुए ही उन्होंने अपने गुरुदेव का जीवन-चरित अंग्रेजी और बांग्ला भाषा में लिखा था। तत्पश्चात सन्यास आश्रम ग्रहण कर सन्यासोत्तर जीवन में उन्होंने बांग्ला और हिंदी भाषा में कई धर्मग्रंथों का प्रणयन किया यथा, अर्घ्यडालि, स्तुतिमाला, निम्बार्क साधन प्रणाली, ‘शांतिर सोपान (Road to Happiness), संशय भंज़न आदि बांग्ला भाषा में, और हिंदी भाषा में शांति का मार्ग (Road to Happiness).

श्रीश्रीगुरुजी महाराज संसाराश्रम में ही भगवत् साक्षात्कार करके सिद्ध मनोरथ हो गए थे और यह सत्य उन्होंने मुझे और अन्य कई शिष्य-शिष्याओं को कहा था। भक्त गण जब उनसे आध्यात्मिक विषयों पर प्रश्न करते थे तो उन्हें इस बात का अनुभव होता था कि श्रीश्रीगुरुजी महाराज अपने ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति के आधार पर उनके प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। आध्यत्मिक जगत में उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है यह बात उन्होंने मुझे कई बार कही थी।

यहाँ पर उनके विषय में विस्तार से लिखना सम्भव नहीं है और जो उनके जीवन के विषय में विशेष रूप से जानना चाहते हैं, वे उनकी जीवनी पाठ कर सकते हैं जो हिंदी, बांग्ला, और अंग्रेजी में उपलब्ध है। १६ वर्ष तक सद्‌गुरुरूपी लीला करने के बाद सन् २००६ में १४ दिसम्बर को उन्होंने महाप्रयाण किया और ब्रह्मलीन हो गए। ब्रह्मज्ञ महापुरुष की मृत्यु नहीं होती इस बात की पुष्टि शास्त्रों ने और अनेक महारापुरुषों ने की है। भक्तगण अब भी महापुरुषों के दर्शन को प्राप्त करते हैं और उनकी कृपा को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में अनुभव करते ही रहते हैं। श्रीश्री गुरुजी महाराज के आश्रित बुहत से शिष्यों ने इस सत्य को अनुभव किया है और इस विषय में किसी को किसी प्रकार का संशय नहीं है।

मेरे परमपूज्यपाद गुरुदेव, काठिया बाबा श्रीश्री १०८ स्वामी कृष्णदासजी महाराज, और मेरे परमपूज्यपाद परदादागुरुजी श्रीश्री १०८ स्वामी संतदासजी महाराज के उपदेश और उनके द्वारा की गयी आध्यात्मिक तत्त्वों की  व्याख्या को प्रकाश करना ही इस वेब साईट का उद्देश्य है। मेरा विश्वास है कि वे मेरे इस कार्य का अनुमोदन करके अपनी अहैतुकी कपा वर्षण के द्वारा इसे स्वीकृति प्रदान करेंगे। श्रीश्रीहंस भगवान से आरम्भ करके इस सम्प्रदाय के समस्त आचार्यों के श्रीचरणों में मेरा बारम्बार दण्डवत् प्रणाम है और उन सब की कृपा प्रार्थना करता हूँ के वे मेरी बुद्धि में अधिष्ठत होकर मेरे इस कार्य में सहायक हों।
               श्रीश्रीमद्‌गुरुस्तोत्रम्‌

सच्चिदानंदस्वरूपाय परमात्मस्वरूपिणे।
सर्वदेवादिदेवाय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(१)

चंदनोक्षितसर्वांगाय काष्ठकौपीनधारिणे।
कोटिसूर्यप्रभानने श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(२)

श्रीप्रेमदासशिष्याय सनकादिककुलभूषणे।
अद्वितीयाय मद्‌गुरवे  श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(३)

आर्तजीवहितार्थाय       नरावतारधारिणे।
मुक्तिसेतुस्वरूपाय   श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(४)

ज्ञानभक्तिपरिपूर्णाय अनंतसुखाभिवर्षिणे।
सर्वशास्त्रपारंगताय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(५)

सर्वविघ्नविनाशाय       सर्वपातकनाशिने।
नमः प्रपन्नपालाय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(६)

अनंतानादिनित्याय   प्रभवे    सर्वव्यापिने।
सर्वविद्यातपोमूलाय  श्रीकृष्णदासाय ते  नमः॥(७)

नित्यानंदनिमग्नाय सर्वगुणकर्मसाक्षिणे।
शांतायात्मरामाय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(८)

सर्वेशाय सर्वाराध्याय भगवते ब्रह्मरुपिणे।
नमो वैकुंठनाथाय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(९)

कृष्णतत्त्वप्रबुद्धाय कृष्णभक्तिप्रदायिने।
नमो वै कृष्णरूपाय श्रीकृष्णदासाय ते नमः॥(१०)

इति केशवदासेन कृतं श्रीश्री मद्‌गुरुस्तोत्रं समाप्तम्।

ॐ श्रीगुरवे नमः

ॐ श्रीहरिः

ॐ तत् सत्

 

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